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सुप्रीम कोर्ट ने सनातन धर्म छोड़ने वाले दलितों का सर्वे कराने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की – सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की धर्मपत्राण करदाताओं के सर्वे को चुनौती देने वाली याचिका -दिल्ली देहात से

याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि इस याचिका के साथ ही संबंधित याचिकाएं की जल्द से जल्द पूरी सुनवाई पूरी की जाए।

नई दिल्ली:

धर्म दत्तक वाले डिटेल्स को भी खाता स्तर का स्तर (सनातन धर्म छोड़ने वाले दलित)
और सच्चाई का लाभ देने की संभावना और उनकी स्थिति की जांच करने के लिए आरोप आयोग द्वारा आरोपित याचिका सुप्रीम कोर्ट (सुप्रीम कोर्ट) ने खारिज कर दी है। याचिका में केंद्र सरकार द्वारा आयोग को रद्द करने की मांग की गई थी।

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याचिकाकर्ता के अनुसार, दाखिलों को ईसाई और इस्लाम धर्म दत्तक के बाद नोटिस क्षेत्र का स्तर और संविधान (अनुसूचित आय) आदेश 1950 को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए लंबित हैं, याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि इस याचिका के साथ ही संबंधित याचिकाओं की जल्द से जल्द सुनवाई पूरी तरह से करें।

याचिका में कहा गया था कि मुख्य याचिका सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में मिली है। जस्टिस के जी बालकृष्णन आयोग को जांच का अधिकार दिया गया है, तो याचिका पर सुनवाई और देरी हो सकती है। याचिका में कहा गया है कि इस तरह की देरी से जाति के मूल ईसाइयों और मुस्लिम अधिकारों का हनन होगा, जिन्हें पिछले 72 वर्षों से जाति की विशेषाधिकार से विशेषाधिकार प्राप्त है।

याचिका में याचिका में कहा गया है कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए कार्यक्षेत्र रंगनाथ मिश्रा आयोग की 2007 की रिपोर्ट में इस्लाम और ईसाई धर्म में संशोधित पर्टैलिटीज को पंजीकृत करने का स्तर दिया गया था।

सोमवार को जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस ओ के याचिकाकर्ता ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि आप कौन हैं और कहां से आए हैं? इस मामले पर तो सुनवाई चल रही है। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है तो फाइनल समानांतर आयोग क्यों बनाया गया? इसे बनाना ही नहीं चाहिए था।

जस्टिस कौल ने कहा कि सरकार को संविधान के तहत ये अधिकार हैं। सरकार ने अपना विवेक से आयोग बनाया है। आप तो आयोग के विधान को ही चुनौती दे रहे हैं। याचिकाकर्ता ने फिर कहा कि जब आप सुन रहे हैं तो आपकी सुनवाई की राह में आयोग बाधा न बने।

पीठासीन ने कहा कि संविधान के लेखे 32 के तहत कोई भी नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय के पास आ सकता है। लेकिन आपकी याचिका को हम उसके अधीन तो सुन नहीं सकते। हमें आपकी अर्जी में कोई तथ्य नहीं मिला है जिसके आधार पर हम सुनते हैं। आपकी याचिका रद्द की जाती है।

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