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कर्पूरी ठाकुर जयंती : जनता के नेता कर्पूरी ठाकुर, जो गरीबों की आवाज के रूप में उभरे, कभी चुनाव नहीं हारे – कर्पूरी ठाकुर जयंती : सर्कल की आवाज उभरती जननायक कर्पूरी ठाकुर को इन कामों के लिए याद किया जाता है -दिल्ली देहात से

कर्पूरी ठाकुर जयंती : जनता के नेता कर्पूरी ठाकुर, जो गरीबों की आवाज के रूप में उभरे, कभी चुनाव नहीं हारे – कर्पूरी ठाकुर जयंती : सर्कल की आवाज उभरती जननायक कर्पूरी ठाकुर को इन कामों के लिए याद किया जाता है
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कर्पूरी ठाकुर ने 1977 में नौकरी में मुंगेरी लाल कमीशन लागू कार परतों-गलतियों को निश्चित किया। (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

बिहार (बिहार) में जन नायक कर्पूरी ठाकुर (जननायक कर्पूरी ठाकुर) की 24 जनवरी को जयंती मनाई जाती है। बिहार के लगभग सभी दल कर्पूरी ठाकुर की विरासत का दावा करते हैं। कपूरी ठाकुर बिहार की राजनीति में दबदबे और दबे-कुचले वर्ग की आवाजें उभर रही थीं। कर्पूरी ठाकुर बिहार में दो बार क्लिक एक बार उप पृष्ठ रहे। इसके साथ ही दशकों तक सभी नेता रहे हैं। कर्पूरी ठाकुर 1952 में पहली बार विधानसभा चुनाव में जीते। जननायक कर्पूरी ठाकुर बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी थे। 1967 में कर्पूरी ठाकुर ने उप-भागीदारी पर बिहार में अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। इसकी वजह से उनकी आलोचना भी हुई।

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वर्ष 1971 में चुने जाने पर ठाकुर ने किसानों को बड़ी राहत देते हुए गैर-जिम्मेदार जमीन पर मालगुजारी टैक्स को खत्म कर दिया था। 1977 में बनने पर नौकरी में मुंगेरी लाल कमीशन लागू कर शेयरधारकों और लेटरों को नटखट देकर वो सवर्णों के दुश्मन बन गए। आइए आज हम कर्पूरी ठाकुर के बारे में जानते हैं।

समस्तीपुर जिले के पिथौझिया गांव में हुआ था जन्म
जननायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म गलीपुर जिले के पिठौझिया गांव में हुआ था। इनके पिता गोकुल ठाकुर गांव के सीमांत किसान थे और अपना पारंपरिक पेशा, नाई का काम करते थे। भारत छोड़ो आंदोलन के समय कर्पूरी ठाकुर ने करीब डेढ़ साल जेल में दांव लगाया।

राजनीति में अजेय राजनेता थे ठाकुर
जननायक कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 और 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 के दौरान दो बार बिहार के पेज रहे। बिहार के नाई परिवार में जन्में ठाकुर अखिल भारतीय छात्र संघ में रहे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण व समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया के राजनीतिक गुरु थे। बिहार में पिछड़े वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरी में तथ्यों की व्यवस्था की शुरुआत की थी।

आखिरी समय तक उनका घर भी नहीं था
कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार और दशकों से विधायक और विरोधी दलों के नेता रहे हैं। वर्ष 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीते। राजनीति में पहुंच यात्रा के बाद भी जब उनका निधन हुआ तो उनके परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके पास नाम नहीं था। वे अपने जुड़ाव में समाज के हित में काम कर रहे हैं।

कर्पूरी ठाकुर को क्यों कहा जाता है जननायक
राजनीति के जानकारियों के अनुसार जननायक कर्पूरी ठाकुर की लोकप्रियता के कारण उन्हें जननायक कहा जाता है। जननायक कर्पूरी ठाकुर भारत की स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक राजनीतिज्ञ और बिहार के अन्य उपमख्यमंत्री भी रह गए हैं। नाई जाति में जन्म लेने वाले कर्पूरी सरल हृदय के राजनेता माने जाते थे और सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति से जुड़े थे, लेकिन वे राजनीति को जनसेवा की भावना के साथ जिया था। उनकी सेवा भावना के कारण ही उन्हें जननायक कहा जाता है।

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