दिल्ली देहात से….

हरीश चौधरी के साथ….

मध्य प्रदेश: स्ट्रॉ से बनेगी हाईब्रिड लकड़ी, प्लाइवुड से सस्ती और मजबूत होगी- NDTV हिंदी NDTV इंडिया -दिल्ली देहात से

भोले:

हर साल देश के कई हिस्सों में और खासकर दिल्ली और आसपास की सर्दी ही पराली जलाए जाने के कारण प्रदूषण का कहर देखा जाता है। पराली जलाने के कारण दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। पराली का धुआं दिल्ली ही नहीं, इसके आसपास के कई किलोमीटर के इलाके को बांटता है, लेकिन मध्य प्रदेश में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद इसका हल ढूंढता है, भोपाल में हुए अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव में इसे प्रदशित भी किया गया। देश के क्षेत्रों में लगभग 150 मिलियन टन एग्रो वेस्ट सब्सक्राइब है, जिसका पराली का हिस्सा लगभग 55 मिलियन है, हर साल इसके दाग से दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके के लोग धूम मचाते हैं, लेकिन भोपाल में सीएसआईआर की उन्नत सामग्री और प्रमाणित सामग्री ( एएमपीआरआई) के मांझी ने पराली को हाइब्रिड वुड में बदलने की तकनीक इजाद की है जो पारंपरिक फ्लैज की तुलना में 30% फ़्रेक्स और 20% मज़बूत है।

यह भी पढ़ें

सीएसआईआर-एएमपीआरआई के प्रमुख साइंटिस्ट अशोकन पप्पू ने कहा कि इसे बनाने के लिए धोखा और परली आओ, हम लोग पंजाब पंजाब हरियाणा में इंडस्ट्री कलस्टर बनाने की सोच रहे हैं ये अलग-अलग थिकनेस में बन सकता है इससे लिमिटेड भी बोर्ड बन सकता है, हम उच्च गुणवत्ता और चमकदार फिनिश वाले कंपोजिट का उत्पादन करते हैं जो एक पॉलीमेरिक सिस्टम में 60% पराली का उपयोग करता है। ये पार्टिकल बोर्ड और प्लाईबोर्ड की तुलना कहीं बेहतर है।हर पराली को रिसाइकिल करने के लिए पंजाब और हरियाणा के कई स्टेक होल्डर्स से बातचीत की, हमने भारत और अमेरिका में पेटेंट के लिए भी आवेदन किया है।

2010 में सीएस इर के वैज्ञानिक सिंगरौली और आस-पास के इलाके में थर्मल पावर प्लांट से आगजनीवाले फ्लाईड ऐश के प्रदूषण के लिए काम कर रहे थे, उसी दौरान इस तकनीक का इजाद हुआ, अब इसका प्रयोग पराली पर हो रहा है। सीएसआईआर-एएमपीआरआई के निदेशक अवनीश कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि यहां हम कंपोजिट पर काम करते हैं इस तरह से कि ये पैनल, प्लायवुड का रिप्लसमेंट बने, पूरी प्रक्रिया के कमरे के तापमान पर पूरी तरह से लगाया जाता है, यानी इसमें ज्यादा ऊर्जा की जरूरत नहीं है।

इसकी पूरी रूपरेखा के अनुसार परीक्षण किया गया है, पराली से तैयार लकड़ी से दरवाजा, फाल्स सीलिंग, रिकॉर्डिंग दीवार पैनल, विभाजन और फर्नीचर बन सकते हैं। इससे रोजगार भी पैदा होगा और किसानों की आय में भी। भोपाल में आयोजित 8वें अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव में ये तकनीक प्रयोगशाला से बाहर आई है, उम्मीद है कि अगले 2 वर्षों में ये बाज़ार में होगा। इस उत्पाद का लाइसेंस प्रौद्योगिकी छत्तीसगढ़ स्थित औद्योगिक इकाई को दिया गया है और उम्मीद है कि सीएस इर की इस तकनीक का उपयोग द्वारा कई और उद्योग स्थापित किए जाएंगे।

ये भी पढ़ें-

दिन का विशेष रुप से प्रदर्शित वीडियो

सुप्रीम कोर्ट 26 जनवरी को हज़ार से ज़्यादा दस्तावेज़ का 10 आकाशगंगा में जारी करेगा