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Gurjar History

गुर्जर समुंदाय का इतिहास और सामाजिक तानाबाना | Gurjar History | दिल्ली देहात से

गुर्जर समुंदाय का इतिहास और सामाजिक तानाबाना | Gurjar History | दिल्ली देहात से

गुर्जर समुंदाय का इतिहास और सामाजिक तानाबाना | Gurjar History | दिल्ली देहात से

भारत में अनेक समुदाय साथ साथ रहते हैं और सभी की अपनी अपनी विशेषताएँ हैं। दिल्ली देहात से.. के इस अंक में आज हम गुर्जर समुदाय की चर्चा करेंगे जो अपनी जीवटता और मेहनत के लिए जानी जाती। गुर्जर समुदाय एक खानाबदोश समुदाय हुआ करती थी जिसका इतिहास मूलत मध्य एशिया के कोकेशस प्रांत से जोड़ा जाता है.जहाँ आज जोर्जिया और अरमेनिया जैसे देश बसे हैं। इतिहासकारों की माने तो यह समुदाय चोधी से छठी शताब्दी के दौरान मध्य एशिया से अफगानिस्तान, खाइबर पास के रस्ते आज के भारत के गुजरात प्रांत तक आए। कुषान व हुण वंश वो शुरुआती कबीले थे जो उस समय के भारत के सत्तासीन राजवंशों से कई संघर्षों के बाद यहाँ के इतिहास का हिस्सा बने।

गुर्जर राजवंशो के समय के साथ विघटित होते रहने से यह समुदाय फिर से धीरे धीर कबीलों में बदलने लगे। परंपरागत रूप से गुर्जर खानाबदोश चरवाहे के समय के साथ उन्होंने खेती

और पशुपालन का काम अपनाया। जहां एक तरफ इस समुदाय में अनेक जातियों का समावेश हे वहीं दूसरी तरफ इस समुदाय में इस्लाम और हिंदू दोनों ही धर्मों को मानने वाले लोग हैं। आज के गुर्जर समुदाय में ज्यादातर कृषि और पशुपालन भी करते हैं।

गुर्जर समुदाय का विस्तार भारत में उत्तर भारत के जम्मुकशमीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात तक है। राजस्थान में इनका काफी सम्मान हे और इनकी तुलना जाटों या मीणा समुदाय से एक हद तक की जा सकती है। उत्तर प्रदेश, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में रहने वाले गूजरों की स्थिति थोड़ी अलग हे जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों ही गुर्जर देखे जा सकते हैं जबकि राजस्थान में सारे गुर्जर हिंदू हे

समाजशानियों के अनुसार हिंदूवर्ण व्यवस्था में इन्हें क्षत्रिय वर्गमिरखा जा सकता है लेकिन जाति के आधार पर ये राजपूतों से पिछड़े माने जाते हैं.

भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत गुर्जर को हिमाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के रूप में अधिसूचित किया गया है। यह लिस्टिंग उन्हें सरकारी नौकरियों ओर उच्च

शिक्षण संस्थानों में निश्चित कोटा के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में कम बेंचमार्क जैसे विशेष लाभ प्रदान करती है।

भाषा के संदर्भ में गुर्जर समुदाय उन राज्यों की भाषा बोलते हैं जिनमें वे रहते हैं। पंजाब, दिल्ली और मध्य प्रदेश में हिंदू बहुल गुर्जर आपस में हिंदी बोलते हैं और देवनागरी लिपि का उपयोग करते हैं। जबकि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में वे अपनी मातृभाषा के रूप में गुजरी बोलते हैं। जबकि जम्मू

और कश्मीर में, कश्मीरी या हिंदी उनकी पहली भाषा है वहीं वे राजस्थान में मारवाड़ी बोलते हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब के मुस्लिम बहूल गुर्जर समुदाय के लोग उर्दू को अपनी पहती भाषा के रूप में बोलते हैं।

हालांकि गुर्जर समुदाय शहरी व संभ्रांत परिवारों के लोगों ने शिक्षा की महत्ता पर बहुत ज़ोर दिया है। साथ इस से खेल कूद में भी आगे रहे हैं। मगर बड़े पैमाने पर देखा जाए गुर्जर समुदाय में साक्षरता के प्रति जागरूकता अन्य समुदायों की तुलना में विशेष रूप से लड़कियों के लिए कम है। जिसका पुरुष महिता लिंग अनुपात पर एक नकारात्मक असर पड़ता है।

गुर्जर समुदाय काफी बड़ी समुदाय है, जिनकी संख्या लगभग 60 लाख है। जो मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली में फैले हुए है। दिल्ली की बात करे तो दिल्ली प्रदेश में गुर्जर समाज के लगभग 80 गांव है | जिससे इनकी संख्या का दिल्ली की कुल आबादी की तुलना में पता लगाया जा सकता है।

आज गुर्जर समुदाय नए जमाने के साथ पूरी सरगर्मी से प्रगति के राह पर अग्रसर है। यह समुदाय मुख्य धारा से जुड़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।दिल्ली में अन्य पिछड़ावर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री हरिओम डेढ़ा इस प्रयास में इस समुदाय के उत्थान के लिए कई सार्थक कदम उठाए हैं। इन्हीं जैसे कई महानुभावों के अनुभव व मार्गदर्शन से इस समुदाय का भविष्य उज्ज्वल है।

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